Guru Grah Seva Dham

💀 प्रेत भोजन 💀

प्रेत भोजन 💀
एक बार महर्षि गौतम ने प्रेतों से पूछा – संसार में कोई भी प्राणी बिना भोजन के नहीं रहते अतः बताओ तुम लोग क्या आहार करते हो
प्रेतों ने कहा-

हे द्विजश्रेष्ठ !
जहाँ भोजन के समय आपस में कलह होने लगता है वहाँ उस अन्न के रस को हम ही खाते हैं।
जहाँ ब्राह्मण शौचाचार से भ्रष्ट होते हैं वहाँ हमको भोजन मिलता है।
जो पैर धोये बिना खाता हैं,
जो दक्षिण की ओर मुँह करके भोजन करता है,
जो भोजन करते समय अधिक बोलता है ।
जो भोजन करते समय भोजन को बहुत फैलाता है ।
जो हर समय थाली में भोजन छोड़ता है ।
जो सिर पर वस्त्र लपेटकर भोजन करता है, उसके उस अन्न को सदा हम प्रेत ही खाते हैं।

जहाँ रजस्वला स्त्री-चाण्डाल और सूअर श्राद्ध के अन्न पर दृष्टि डाल देते हैं, वह अन्न पितरों का नहीं हम प्रेतों का ही भोजन होता है।

जिस घर में सदा जूठन पड़ा रहता है,
निरन्तर कलह होता रहे, वहाँ हम प्रेत लोग भोजन करते हैं।

गौतम ने पूछा -किस कर्म के परिणाम में मनुष्य प्रेत भाव को प्राप्त होता है?

प्रेत बोले -जो धरोहर हड़प लेते हैं,
जूठे मुँह यात्रा करते हैं,
गाय और ब्राह्मण की हत्या करने वाले हैं
वे प्रेत योनि को प्राप्त होते हैं।
चुगली करनेवाले,
झूठी गवाही देने वाले,
न्याय के पक्ष में नहीं रहने वाले, वे मरने पर प्रेत होते हैं।

सूर्य की ओर मुँह करके थूक-खकार और मल-मूत्र का त्याग करते हैं, वे प्रेत शरीर प्राप्त करके दीर्घकाल तक उसी में स्थित रहते हैं।

गौ-ब्राह्मण तथा रोगी को जब कुछ दिया जाता हो उस समय जो न देने की सलाह देते हैं, वे भी प्रेत ही होते हैं,


जो विश्वासघाती, ब्रह्महत्यारा, स्त्रीवध करने वाला, गोघाती, गुरुघाती और पितृहत्या करने वाला है वह मनुष्य भी प्रेत होता है।
मरने पर जिसका अन्तिम संस्कार तथा श्राद्ध नहीं किये गये हैं, उसको भी प्रेतयोनि प्राप्त होती है।

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